अनुच्छेद 370 पर फैसला देते समय मैं कश्मीरी हिंदू नहीं, जज था: जस्टिस कौल
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले और जम्मू-कश्मीर के अतीत से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश के रूप में काम करते समय व्यक्तिगत विरासत और पारिवारिक इतिहास को न्यायिक फैसलों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। उनके मुताबिक, अदालत में उनकी भूमिका एक संवैधानिक न्यायाधीश की थी, न कि कश्मीरी हिंदू समुदाय के सदस्य के रूप में किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व करने की।
28 अक्टूबर को ANI से बातचीत में जस्टिस कौल ने 1947 के विभाजन से जुड़े अपने परिवार के अनुभवों, कश्मीर में लंबे समय तक चली हिंसा और न्यायिक निष्पक्षता पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि अतीत के दर्द को समझना जरूरी है, लेकिन समाज को आगे बढ़ने के लिए संवाद और समाधान का रास्ता भी तलाशना होगा।
अनुच्छेद 370 पर फैसले के दौरान न्यायिक भूमिका को प्राथमिकता
दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा था। जस्टिस संजय किशन कौल इस पीठ का हिस्सा थे। उन्होंने बताया कि इस मामले में फैसला करते समय उन्होंने अपनी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के बजाय संवैधानिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी।
जस्टिस कौल ने कहा कि उनका परिवार 1947 के विभाजन से प्रभावित हुआ था और कश्मीर से जुड़े घटनाक्रमों का असर भी परिवार ने महसूस किया। इसके बावजूद, न्यायाधीश के रूप में उन्हें कानून और संविधान के आधार पर काम करना था। उनका मानना है कि न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति को अपने निजी अनुभवों से ऊपर उठकर निष्पक्ष निर्णय देना चाहिए।
उनकी टिप्पणी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर चलने वाली व्यापक बहस के बीच आई है। जस्टिस कौल ने स्पष्ट किया कि किसी फैसले से अलग-अलग राजनीतिक या सामाजिक समूहों की सहमति और असहमति हो सकती है, लेकिन निर्णय का आधार कानून और उपलब्ध तथ्य होने चाहिए।
कश्मीर में सुलह और न्याय के लिए आयोग की जरूरत
जस्टिस कौल ने जम्मू-कश्मीर में 1980 के दशक के अंतिम वर्षों से सामने आए मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए एक निष्पक्ष सत्य एवं सुलह आयोग गठित करने की सिफारिश की थी। अनुच्छेद 370 पर फैसले के साथ दिए गए अपने सहमति वाले अलग मत में उन्होंने राज्य और गैर-राज्य पक्षों से जुड़े कथित उल्लंघनों की जांच तथा पीड़ितों के अनुभवों को दर्ज करने की जरूरत पर जोर दिया था।
उन्होंने कहा कि प्रभावित समुदायों की प्रमुख शिकायतों में यह भावना शामिल है कि उनके साथ हुई घटनाओं और गलतियों को पर्याप्त रूप से स्वीकार नहीं किया गया। उनके अनुसार, अतीत में जो कुछ गलत हुआ, उसे स्वीकार करना और पीड़ितों के दर्द को मान्यता देना सुलह की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
जस्टिस कौल ने यह भी कहा कि लंबे समय तक चले संघर्ष में अलग-अलग पक्षों के लोगों ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया। सुरक्षा बलों की कार्रवाई के दौरान भी कुछ गलतियां हुई हों, तो उनकी जांच और समाधान की जरूरत है। उनका मानना है कि स्थायी शांति के लिए पीड़ितों को न्याय, संवाद और मानसिक राहत का अवसर मिलना चाहिए।
राफेल मामले और वायरल तस्वीर पर भी दी सफाई
राफेल लड़ाकू विमान सौदे से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना के सवाल पर जस्टिस कौल ने न्यायिक समीक्षा की सीमाओं का बचाव किया। उन्होंने कहा कि रक्षा खरीद जैसे मामलों में सरकार और संबंधित विशेषज्ञ संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। अदालत रिकॉर्ड की जांच कर सकती है, लेकिन उसे वायुसेना की तकनीकी विशेषज्ञता का स्थान लेने वाली संस्था नहीं बनना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी आपराधिक कृत्य के आरोप हैं, तो उनके लिए उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
न्यायिक फैसलों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को लेकर उन्होंने कहा कि उनके कुछ निर्णय सरकार के पक्ष में रहे, जबकि कुछ उसके खिलाफ भी गए। उनके अनुसार, किसी फैसले से किस पक्ष को असंतोष है, यह न्यायिक निष्पक्षता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता।
इंटरव्यू में जस्टिस कौल ने पत्रकार सौरव दास के साथ अपनी वायरल तस्वीर पर भी स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि यह तस्वीर लगभग एक साल पहले दिवाली के दौरान एक अनौपचारिक मुलाकात में ली गई थी। उस समय दास चर्चित राजनीतिक गतिविधियों से नहीं जुड़े थे। जस्टिस कौल ने उनके राजनीतिक विचारों का समर्थन करने या उन्हें मार्गदर्शन देने के दावों को खारिज किया। उन्होंने बताया कि एक युवा पत्रकार के तौर पर दास से उन्होंने केवल अपनी भाषा को थोड़ा संयमित रखने की सलाह दी थी।

