सलमान खुर्शीद बोले- किसी देश के पिछलग्गू नहीं बन सकते, मोदी सरकार की विदेश नीति पर उठाए सवाल
नई दिल्ली: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के विदेश नीति से जुड़े बयानों का समर्थन किया है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को उन्होंने कहा कि भारत को किसी भी ताकतवर देश के सामने अपनी स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मसम्मान से समझौता नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक, दूसरे देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना जरूरी है, लेकिन भारत की विदेश नीति का आधार राष्ट्रीय हित होना चाहिए।
खुर्शीद ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसकी सफलता का आकलन केवल बयानों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से किया जाना चाहिए। उन्होंने व्यापार समझौते, एच-1बी वीजा से जुड़ी चिंताओं और भारतीय नागरिकों को हथकड़ी लगाकर वापस भेजे जाने की घटनाओं का भी उल्लेख किया।
राहुल गांधी के बयान का समर्थन, कूटनीति में प्रतीकों को बताया अहम
सलमान खुर्शीद ने कहा कि विदेश नीति जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा को हल्के राजनीतिक विवाद या बहस की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, राहुल गांधी ने दूसरे देशों के साथ भारत के संबंधों और कूटनीतिक मुलाकातों के संदेश को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। इन सवालों का जवाब देने के बजाय बहस को दूसरी दिशा में ले जाना उचित नहीं है।
उन्होंने समझाया कि किसी देश की राजधानी उसकी राजनीतिक और संस्थागत व्यवस्था का प्रतीक होती है। यदि कोई विदेशी प्रतिनिधि किसी विशेष कारोबारी या स्थानीय उद्देश्य से दूसरे शहर जाता है, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अगर उद्देश्य पूरे देश के साथ व्यापक संबंध मजबूत करना है, तो उसकी राजनीतिक राजधानी को नजरअंदाज करना अलग संदेश दे सकता है।
खुर्शीद ने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति और वहां की सरकार के साथ व्यापक संबंध विकसित करना चाहता है, तो केवल टेक्सास जाकर लौट आना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। ऐसे उद्देश्य के लिए वाशिंगटन जाना भी महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिष्टाचार मुलाकातों पर आपत्ति नहीं है, लेकिन कूटनीति में स्थान और प्रतीकों का अपना महत्व होता है।
अमेरिका, रूस और चीन से रिश्ते, लेकिन आत्मसम्मान से समझौता नहीं
खुर्शीद ने कहा कि कांग्रेस अमेरिका के साथ अच्छे संबंधों की समर्थक रही है। हालांकि, भारत को रूस, चीन और यूरोप सहित सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि किसी देश की आर्थिक या सामरिक ताकत के कारण भारत को उसके सामने झुकने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने 1972 के शिमला सम्मेलन का भी उल्लेख किया, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच बातचीत हुई थी। खुर्शीद के मुताबिक, शिखर वार्ताओं के लिए व्यापक तैयारी, आपसी विचार-विमर्श और दस्तावेजों पर काम करना पड़ता है। इसलिए औपचारिक कूटनीतिक बैठक और शिष्टाचार मुलाकात के बीच अंतर समझना जरूरी है।
कांग्रेस नेता ने केंद्र सरकार से विदेश नीति के ठोस परिणाम सामने रखने की मांग भी की। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार की विदेश नीति इतनी प्रभावी है, तो अब तक अपेक्षित व्यापार समझौता क्यों नहीं हुआ और एच-1बी वीजा से जुड़ी चिंताओं का संतोषजनक समाधान क्यों नहीं दिखाई देता। ये सवाल उन्होंने अपनी राजनीतिक आलोचना के तौर पर उठाए।
राहुल गांधी की विदेश यात्राओं और विरोध के अधिकार पर भी बोले
राहुल गांधी की विदेश यात्राओं को लेकर बीजेपी की ओर से लगाए जाने वाले आरोपों पर खुर्शीद ने कहा कि आधिकारिक यात्राओं और निजी दौरों के बीच अंतर होना चाहिए। उन्होंने माना कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को आधिकारिक यात्रा के दौरान निर्धारित नियमों और अनुमति संबंधी शर्तों का पालन करना चाहिए। हालांकि, उनके अनुसार निजी गतिविधियों की जानकारी सार्वजनिक करने का प्रश्न अलग है और इसमें निजता के अधिकार को भी ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने राजनीतिक मतभेदों के आधार पर किसी व्यक्ति को देशद्रोही करार देने की प्रवृत्ति की आलोचना की। खुर्शीद ने कहा कि भारतीय संविधान लोगों को अपने विचार रखने और उन्हें व्यक्त करने का अधिकार देता है। सरकार की नीतियों से असहमति रखने वाले हर व्यक्ति को राष्ट्रविरोधी बताना उचित नहीं है।
खुर्शीद ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत संवैधानिक अधिकारों के तहत सवाल पूछ सकती है और संबंधित पक्षों को जवाब देना चाहिए। साथ ही, उन्होंने जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए विश्वसनीय शिकायत या उचित आधार होना जरूरी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्षी मांग पर भी खुर्शीद ने अपनी राय रखी। उन्होंने निर्वाचन आयोग के फैसलों में तीनों आयुक्तों की सहमति या कम से कम दो सदस्यों के समर्थन के महत्व पर जोर दिया। उनके मुताबिक, किसी फैसले की वैधता पर सवाल उठने की स्थिति में यह देखना आवश्यक है कि संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ है या नहीं।
कुल मिलाकर, सलमान खुर्शीद के बयान ने विदेश नीति, राजनीतिक जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर कांग्रेस तथा केंद्र सरकार के बीच जारी बहस को फिर सामने ला दिया है।

