हिमाचल में पोषण नीति 2026 को मंजूरी, अब पौष्टिक भोजन और फूड टेस्टिंग पर जोर
हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में कुपोषण, एनीमिया और पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याओं से निपटने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने हिमाचल प्रदेश पोषण नीति 2026 को मंजूरी दे दी है। इस नीति का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित, पौष्टिक और किफायती भोजन उपलब्ध कराने के साथ स्वस्थ खानपान की आदतों को बढ़ावा देना है।
सरकार की इस पहल में बच्चों, गर्भवती महिलाओं, किशोरों और समाज के कमजोर वर्गों के पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही हिमाचल के पारंपरिक खाद्य पदार्थों, स्थानीय अनाज, दालों, हरी सब्जियों और मौसमी फलों को दैनिक आहार में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
नीति के तहत अलग-अलग सरकारी विभाग मिलकर काम करेंगे, ताकि पोषण से जुड़ी योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू किया जा सके। सरकार का मानना है कि बेहतर पोषण से लोगों के स्वास्थ्य में सुधार होगा और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ बनाने में मदद मिलेगी।
बच्चों, महिलाओं और दूरदराज के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान
हिमाचल प्रदेश पोषण नीति 2026 में जीवन के अलग-अलग चरणों की पोषण संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। इसमें जीवन के शुरुआती 1,000 दिनों को विशेष महत्व दिया गया है। इस अवधि में गर्भावस्था से लेकर बच्चे के शुरुआती विकास तक उचित पोषण उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण माना जाता है।
नीति के तहत मातृ एवं शिशु पोषण, किशोरों के स्वास्थ्य और कमजोर वर्गों की जरूरतों पर ध्यान दिया जाएगा। दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए पोषण तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर बनाने की भी योजना है।
सरकार स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देगी। इनमें मोटे अनाज, दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां, डेयरी उत्पाद और मौसमी फल शामिल हैं। इसका उद्देश्य ऐसा संतुलित आहार प्रोत्साहित करना है, जिसे परिवार अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और स्थानीय खानपान की परंपराओं के अनुसार अपना सकें।
पोषण योजनाओं के लिए बनेगी राज्य और जिला स्तरीय व्यवस्था
नई नीति में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा, कृषि, बागवानी, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, जल शक्ति और ग्रामीण विकास सहित कई विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने का प्रस्ताव है।
इसके लिए राज्य पोषण समन्वय प्रकोष्ठ (SNCC) और जिला पोषण समन्वय प्रकोष्ठ (DNCCs) स्थापित करने की योजना बनाई गई है। इन इकाइयों के जरिए पोषण संबंधी योजनाओं की योजना बनाने, उन्हें लागू करने और उनकी निगरानी करने में मदद मिलेगी।
नीति के तहत एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS), पीएम पोषण योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) से जुड़े कार्यक्रमों को भी मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही समुदाय की भागीदारी, पोषण जागरूकता और लोगों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अभियान चलाने की बात कही गई है।
सरकार का लक्ष्य केवल योजनाएं संचालित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उनका लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे और परिवार पौष्टिक भोजन के महत्व को समझें।
खाद्य मिलावट पकड़ने के लिए प्रयोगशालाएं होंगी मजबूत
पोषण नीति का एक अहम हिस्सा खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है। इसके तहत कंडाघाट स्थित संयुक्त परीक्षण प्रयोगशाला (CTL) को उन्नत बनाने और राज्य में चार प्रयोगशालाएं स्थापित करने की योजना है। इनके संचालन के लिए आवश्यक पदों के सृजन और उन्हें भरने का भी प्रस्ताव है।
सरकार के अनुसार, धर्मशाला में नई प्रयोगशाला स्थापित करने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है। इन सुविधाओं से खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच, मिलावट और दूषित सामग्री का पता लगाने तथा निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुपालन की निगरानी में मदद मिलने की उम्मीद है।
नीति में मोबाइल फूड टेस्टिंग सुविधाएं, पानी की गुणवत्ता की निगरानी और प्रयोगशाला आधारित जांच को भी महत्व दिया गया है। इसके अलावा, पोषण से संबंधित आंकड़ों को एक जगह उपलब्ध कराने के लिए प्रस्तावित राज्य पोषण पोर्टल की योजना है। इससे अधिकारियों को आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने और जरूरत पड़ने पर समय रहते सुधारात्मक कदम उठाने में सहायता मिल सकती है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि पोषण मानव विकास का बुनियादी आधार है और हर बच्चे, महिला तथा नागरिक को सुरक्षित, पौष्टिक और किफायती भोजन मिलना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया कि नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने से कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी कम करने में मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश पोषण नीति 2026 का उद्देश्य बेहतर खानपान, मजबूत खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और विभागों के बीच समन्वय के जरिए राज्य के लोगों के स्वास्थ्य में सुधार करना है। हालांकि, इसके वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि प्रस्तावित योजनाओं को कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है।

