नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, BNSS नोटिस को दी चुनौती
नई दिल्ली: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेता नेहा बोरा को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 130 के तहत जारी नोटिस के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार, 22 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद की पीठ ने याचिकाकर्ता और राज्य सरकार, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय लिया। मामला शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने से जुड़ी निवारक कार्रवाई से संबंधित है।
नेहा बोरा ने अदालत में नोटिस को चुनौती देते हुए दलील दी कि संबंधित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) ने नोटिस जारी करने से पहले उपलब्ध सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया। वहीं, राज्य सरकार ने कहा कि संभावित शांति भंग होने की आशंका को देखते हुए कानून के तहत निवारक कार्रवाई शुरू की गई थी।
नेहा बोरा के वकील ने नोटिस की वैधता पर उठाए सवाल
नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में कहा कि उनकी मुवक्किल ने विरोध प्रदर्शन के निर्धारित स्थल में बदलाव के बाद मंडी हाउस में एक सभा आयोजित करने की बात कही थी। उनके अनुसार, 15 अक्टूबर को प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी और अगले दिन सोशल मीडिया पर सभा से संबंधित पोस्ट साझा की गई थी। वकील का तर्क था कि इस पोस्ट में हिंसा भड़काने या किसी गैरकानूनी गतिविधि का आह्वान नहीं किया गया था।
बचाव पक्ष ने दावा किया कि 16 अक्टूबर की शाम मंडी हाउस पहुंचने के कुछ ही समय बाद नेहा बोरा को हिरासत में ले लिया गया। वकील ने नोटिस में तथ्यों से जुड़ी कथित गलतियों और प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केवल बॉन्ड भरने के लिए कह देना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया और संबंधित अधिकारी की स्वतंत्र संतुष्टि जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि नोटिस जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट को पुलिस की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी की विश्वसनीयता पर विचार करना चाहिए था। इसी आधार पर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया पर अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया के पालन को महत्वपूर्ण बताया। अदालत ने यह भी सवाल किया कि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति से बॉन्ड भरने की अपेक्षा किस सीमा तक की जा सकती है। पीठ ने BNSS की धाराओं 126, 130 और 135 के आपसी संबंध तथा नोटिस में संबंधित प्रावधानों के इस्तेमाल पर भी विचार किया।
अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या मजिस्ट्रेट ने शांति भंग होने की आशंका पर स्वतंत्र रूप से विचार किया था और नोटिस के आधार बने दस्तावेज दूसरे पक्ष को उपलब्ध कराए जाएंगे या नहीं। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने जवाब दिया कि संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए कहा कि धारा 126 संभावित शांति भंग की स्थिति में निवारक कार्रवाई की अनुमति देती है और धाराओं को एक साथ पढ़कर समझना चाहिए।
राज्य सरकार ने FIR और पुलिस रिकॉर्ड का दिया हवाला
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता आशीष दीक्षित ने नोटिस का बचाव किया। उनका कहना था कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिपोर्ट, सामान्य डायरी की प्रविष्टियों और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करने के बाद कार्रवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान छह FIR और घटना के समय की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया।
सरकार ने तर्क दिया कि नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि नेहा बोरा के खिलाफ अंतिम निर्णय हो चुका है या उन पर कोई दंड लगाया गया है। उनके अनुसार, संबंधित कार्यवाही का उद्देश्य संभावित अशांति को रोकना है। बचाव पक्ष ने इसके विपरीत कहा कि चुनौती आरोपों की सच्चाई पर नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के पालन पर केंद्रित है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। अब अदालत के अंतिम निर्णय से स्पष्ट होगा कि BNSS की संबंधित धाराओं के तहत जारी नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका पर क्या रुख अपनाया जाता है।

