सुधाकर सिंह की ओम बिरला को चिट्ठी, 5 करोड़ के नोटिस पर बढ़ा विवाद
पटना: बिहार में भरत भूषण तिवारी की संदिग्ध मौत का मामला अब संसद तक पहुंच गया है। सुधाकर सिंह ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से भेजे गए कथित पांच करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखा है। सुधाकर सिंह ने अपने पत्र में संसदीय विशेषाधिकारों और जनप्रतिनिधियों के दायित्वों का सवाल उठाते हुए मामले की जांच कराने की मांग की है।
बक्सर से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद का कहना है कि जनहित से जुड़े मामलों को उठाने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना संसदीय कामकाज को प्रभावित करने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने अनुरोध किया है कि मामले में प्रथमदृष्टया आधार मिलने पर इसे लोकसभा की विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जाए।
क्या है भरत भूषण तिवारी मामला?
यह विवाद भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को हुई पुलिस मुठभेड़ में भरत भूषण तिवारी की मौत से जुड़ा है। घटना के बाद पुलिस कार्रवाई की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठे थे।
पुलिस के अनुसार, कार्रवाई के दौरान तिवारी ने पुलिसकर्मियों पर गोलीबारी की थी और जवाबी कार्रवाई में वह घायल हो गए। दूसरी ओर, मृतक के परिजनों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। इन आरोपों के बीच बिहार सरकार ने मामले की न्यायिक जांच कराने का फैसला लिया था।
सुधाकर सिंह ने भी इस घटना की परिस्थितियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि जांच केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि आदेश देने की प्रक्रिया और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी पड़ताल होनी चाहिए।
हालांकि, मुठभेड़ की वैधता और अलग-अलग पक्षों के आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच के परिणामों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
पांच करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस पर क्या बोले सांसद?
सुधाकर सिंह के मुताबिक, आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन ने अपने निजी अधिवक्ता के माध्यम से उन्हें कानूनी नोटिस भेजा है। सांसद का कहना है कि नोटिस में सार्वजनिक रूप से क्षमायाचना की मांग के साथ पांच करोड़ रुपये के मानहानि दावे और आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
सांसद ने इस नोटिस को अपने सार्वजनिक और संसदीय दायित्वों के संदर्भ में उठाया है। उनका तर्क है कि पुलिस कार्रवाई, नागरिकों के अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषयों पर सवाल उठाना जनप्रतिनिधि की भूमिका का हिस्सा है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि मानहानि का नोटिस अपने आप में किसी पक्ष की गलती साबित नहीं करता। नोटिस भेजने वाले पक्ष का विस्तृत जवाब या उसका पूरा कानूनी पक्ष उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है। इसलिए विवाद के दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
अनुच्छेद 105 का हवाला देकर उठाया संसदीय विशेषाधिकार का सवाल
लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में सुधाकर सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 105 का उल्लेख किया है। यह अनुच्छेद संसद और उसके सदस्यों के अधिकारों तथा विशेषाधिकारों से संबंधित है। सांसद ने इसी संदर्भ में यह सवाल उठाया कि क्या कानूनी नोटिस के जरिए किसी जनप्रतिनिधि को जनहित के मुद्दे उठाने से रोकने की कोशिश की जा रही है।
सुधाकर सिंह ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह सदन के बाहर दिए गए हर बयान के लिए असीमित कानूनी छूट का दावा नहीं कर रहे हैं। उनका अनुरोध है कि लोकसभा अध्यक्ष मामले की परिस्थितियों की जांच कराएं और जरूरत पड़ने पर इसे संबंधित समिति के पास भेजें।
संसदीय विशेषाधिकारों का उद्देश्य संसद और उसके सदस्यों को अपने संवैधानिक कार्य स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम बनाना है। लेकिन किसी विशेष मामले में इनका दायरा और लागू होने की स्थिति संबंधित तथ्यों, नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर तय होती है।
सरकारी अनुमति और निजी विधि फर्म की भूमिका पर भी सवाल
सांसद ने अपने पत्र में अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के नियम 17 का भी उल्लेख किया है। उन्होंने लोकसभा सचिवालय के माध्यम से बिहार सरकार से यह स्पष्ट कराने का अनुरोध किया है कि नोटिस भेजते समय कुंदन कृष्णन किस हैसियत से कार्य कर रहे थे और क्या इसके लिए किसी प्रकार की सरकारी अनुमति ली गई थी।
उन्होंने संबंधित पत्राचार और सरकारी अभिलेखों की जानकारी मांगे जाने की भी बात कही है। इसके अलावा, नोटिस भेजने वाली निजी विधि फर्म की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया है कि क्या उसे बिहार सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व करने का कोई औपचारिक अधिकार दिया गया था।
ये सवाल सांसद की ओर से पत्र में उठाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित अधिकारी या विधि फर्म ने नियमों का उल्लंघन किया है। इस पहलू पर स्थिति संबंधित दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारियों के जवाब से स्पष्ट होगी।
भरत तिवारी मामले की जांच पर भी टिकी नजर
भरत भूषण तिवारी की मौत को लेकर न्यायिक जांच की प्रक्रिया शुरू की गई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जांच आयोग ने घटना से संबंधित दस्तावेजों और फॉरेंसिक रिपोर्ट सहित अन्य रिकॉर्ड जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी।
सुधाकर सिंह का कहना है कि जांच में घटना की पूरी परिस्थितियों और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को भी शामिल किया जाना चाहिए। उनके पत्र के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लोकसभा अध्यक्ष इस अनुरोध पर क्या रुख अपनाते हैं और बिहार सरकार से मांगी गई जानकारी पर क्या जवाब मिलता है।
इस मामले में तीन अलग-अलग पहलुओं पर नजर रहेगी—भरत भूषण तिवारी की मौत की जांच, पांच करोड़ रुपये के कथित मानहानि नोटिस से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया और संसदीय विशेषाधिकारों पर लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय।
आगे क्या हो सकता है?
लोकसभा अध्यक्ष का कार्यालय पत्र पर विचार कर सकता है और आवश्यक समझे जाने पर संबंधित जानकारी मांग सकता है। विशेषाधिकार समिति को मामला भेजा जाएगा या नहीं, यह सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।
इसी तरह, मानहानि नोटिस के संबंध में आगे की कानूनी प्रक्रिया संबंधित पक्षों के कदमों और लागू कानून के अनुसार चलेगी। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में लोकसभा अध्यक्ष की ओर से इस पत्र पर किसी अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं हुई है।

