IDBI बैंक की बिक्री पर राहुल गांधी को निर्मला सीतारमण का जवाब, बोलीं- कांग्रेस राज में फोनबुक से मिलते थे लोन
IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने के केंद्र सरकार के फैसले को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आलोचना के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासनकाल में बैंकों का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे और चुनिंदा उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता था।
निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कांग्रेस के पुराने बैंकिंग रिकॉर्ड पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के दौर में प्रभावशाली लोगों के लिए अलग व्यवस्था थी, जबकि आम नागरिकों को नियमों के अनुसार ही बैंकिंग सुविधाएं मिलती थीं।
वित्त मंत्री ने अपने बयान में कहा, “कांग्रेस के दौर में ताकतवर लोगों के लिए फोनबुक और आम नागरिकों के लिए नियमों की किताब हुआ करती थी।” उनके मुताबिक, अब बैंकिंग व्यवस्था में राजनीतिक सिफारिश और फोन के जरिए कर्ज दिलाने का दौर समाप्त हो चुका है।
कांग्रेस शासनकाल के बैंकिंग मामलों का किया जिक्र
निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कई पुराने विवादों का उल्लेख किया। उन्होंने 1957 के मुंद्रा मामले का जिक्र किया, जिसमें हरिदास मुंद्रा को कथित राजनीतिक प्रभाव के जरिए एलआईसी से वित्तीय लाभ मिलने का मामला सामने आया था।
इसके अलावा उन्होंने 1976 में तत्कालीन एसबीआई चेयरमैन आरके तलवार को पद से हटाए जाने का मुद्दा उठाया। वित्त मंत्री के अनुसार, तलवार ने राजनीतिक दबाव में कर्ज देने की शर्तों में ढील देने से इनकार किया था। उन्होंने संजय गांधी से जुड़ी मारुति परियोजना और 1980 के दशक में बैंक अधिकारियों पर कर्ज देने के कथित दबाव का भी उल्लेख किया।
उन्होंने यूपीए सरकार के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल पर भी परिवार से जुड़े कारोबार को केनरा बैंक से कर्ज दिलाने के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया।
वित्त मंत्री ने दावा किया कि वीडियोकॉन, विंसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर जैसे बड़े कारोबारी समूहों को दिए गए कर्ज बाद में एनपीए में बदल गए। इससे IDBI बैंक को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
₹52,878 करोड़ में IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने की तैयारी
दरअसल, IDBI बैंक के निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार के फैसले पर राहुल गांधी ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के औद्योगिक विकास के लिए बैंकिंग संस्थानों को मजबूत किया गया, जबकि मौजूदा सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बेचने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
राहुल गांधी ने बैंक कर्मचारियों का समर्थन करते हुए कहा कि निजीकरण से कर्मचारियों की सेवा शर्तों और आरक्षण से जुड़ी सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। उन्होंने विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को लेकर चिंता जताई।
केंद्र सरकार की योजना के तहत IDBI बैंक की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव है। 14 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 52,878 करोड़ रुपये के इस सौदे को मंजूरी दी थी।
इस प्रस्ताव के अनुसार, केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा। बिक्री के बाद सरकार की हिस्सेदारी घटकर 15 प्रतिशत और LIC की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत रह जाएगी। प्रस्तावित खरीदार कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहायक कंपनी है।
सरकार ने बैंक के सुधार और पारदर्शिता का दिया हवाला
निर्मला सीतारमण ने कहा कि मौजूदा सरकार ने IDBI बैंक को आर्थिक संकट से निकालने के लिए पेशेवर प्रबंधन, बेहतर वित्तीय अनुशासन और 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी सहायता दी है।
उन्होंने दावा किया कि बैंक की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में स्वतंत्र मूल्यांकन और पारदर्शी बोली व्यवस्था अपनाई गई है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दूसरे चरण की प्रक्रिया के दौरान संशोधित व्यवस्था से प्राप्त बोली मूल्य में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई।
वित्त मंत्री ने फरवरी 2024 में जारी भारतीय अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि बैंकिंग व्यवस्था में सुधार और आम लोगों को आसानी से कर्ज उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता है।
फिलहाल IDBI बैंक की बिक्री को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव जारी है। एक तरफ सरकार इसे बैंक के विकास और बेहतर प्रबंधन का अवसर बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण का मामला मानकर विरोध कर रही है।

