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राम मंदिर चंदा विवाद पर कांग्रेस का हमला, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग

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अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट में कथित वित्तीय अनियमितताओं और दान की राशि के प्रबंधन को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की स्वतंत्र जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कराने की मांग की है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस मामले पर जवाब देने की अपील की है।

27 अक्टूबर 2026 को ANI की रिपोर्ट के अनुसार, जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आरोप लगाया कि मंदिर ट्रस्ट में वित्तीय निगरानी की कमियों के बारे में पहले ही चेतावनी दी गई थी, लेकिन कथित अनियमितताओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि व्यवस्था में खामियों की जानकारी पहले से थी, तो जिम्मेदार लोगों की भूमिका की व्यापक जांच क्यों नहीं हुई।

हालांकि, ये आरोप कांग्रेस नेता की ओर से लगाए गए हैं। इन्हें अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। मामले में आरोपों की पुष्टि और जिम्मेदारी तय करना निष्पक्ष जांच तथा संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण पर निर्भर करेगा।

ऑडिट रिपोर्ट और CCTV फुटेज को लेकर कांग्रेस ने उठाए सवाल

जयराम रमेश के मुताबिक, फरवरी 2020 में ट्रस्ट के गठन के कुछ महीनों बाद नवंबर 2020 में एक निजी ऑडिट फर्म ने आंतरिक ऑडिट और जोखिम प्रबंधन से जुड़ी कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। उनके अनुसार, रिपोर्ट में संगठनात्मक जिम्मेदारियों की अस्पष्टता, दान का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखने में कमी और वित्तीय लेनदेन की दोबारा जांच के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने जैसे मुद्दे शामिल थे।

कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि कर्मचारियों के प्रबंधन के लिए औपचारिक व्यवस्था, बैंक खातों के मिलान के लिए योग्य लेखा कर्मचारियों और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े आंकड़ों की सुरक्षा के लिए प्रभावी सत्यापन प्रणाली की कमी बताई गई थी। उन्होंने कहा कि दान में मिलने वाले सोने-चांदी के आभूषणों जैसी मूल्यवान वस्तुओं का रिकॉर्ड रखने के लिए भी स्पष्ट प्रक्रिया बनाने की जरूरत बताई गई थी।

रमेश ने विशेष जांच दल (SIT) की कार्रवाई का हवाला देते हुए दावा किया कि काउंटिंग रूम से 105 बार अनधिकृत रूप से नकदी निकाले जाने की बात सामने आई। उनके अनुसार, कुछ कर्मचारियों पर CCTV कैमरों का दृश्य बाधित करने का भी आरोप है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और घटनाओं के पूरे संदर्भ की जानकारी उपलब्ध रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है।

निर्माण कार्यों में कमीशन और फर्जी मजदूरों के आरोप

विवाद केवल दान की राशि तक सीमित नहीं है। कांग्रेस नेता ने मंदिर निर्माण परियोजनाओं से जुड़े रहे इंजीनियर दीनानाथ वर्मा के आरोपों का भी उल्लेख किया। वर्मा के मुताबिक, उन्होंने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को निर्माण ठेकों में कथित तौर पर 40 प्रतिशत कमीशन, फर्जी मजदूरों के नाम दर्ज करने और निर्माण सामग्री की कीमत बढ़ाकर बिल प्रस्तुत करने जैसी शिकायतों से अवगत कराया था।

जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि शिकायतों की जांच कराने के बजाय संबंधित इंजीनियर को पद से हटा दिया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ श्रद्धालुओं की मूल्यवान भेंट स्वीकार किए जाने के बावजूद उन्हें आधिकारिक रसीद नहीं दी गई। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का विस्तृत जवाब उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट में शामिल नहीं है।

कांग्रेस ने राज्य सरकार की ओर से गठित SIT की जांच पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि यदि जांच केवल कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रहती है, तो कथित अनियमितताओं की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ पाएगी।

कांग्रेस की तीन प्रमुख मांगें, सभी जिम्मेदार लोगों की जांच पर जोर

कांग्रेस ने पूरे मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। पार्टी चाहती है कि दान की राशि, जमीन से जुड़े सौदों, निर्माण ठेकों और ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो।

इसके साथ ही कांग्रेस ने वर्ष 2020 से अब तक प्राप्त दान, मूल्यवान वस्तुओं, ऑडिट रिपोर्ट और निर्माण संबंधी बिलों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग उठाई है। पार्टी का कहना है कि श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े संसाधनों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।

फिलहाल इस विवाद में लगाए गए आरोपों और जांच से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि महत्वपूर्ण होगी। आने वाले समय में संबंधित दस्तावेजों, आधिकारिक प्रतिक्रियाओं और जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट हो सकेगा कि वित्तीय प्रबंधन में कहां कमियां थीं और क्या किसी व्यक्ति ने जानबूझकर नियमों का उल्लंघन किया।

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