उमर खालिद-शरजील इमाम ने फिर खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उमर खालिद और शरजील इमाम ने दिल्ली हाई कोर्ट के 30 सितंबर 2026 के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की हैं। हाई कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अब दोनों ने सुप्रीम कोर्ट से राहत देने की मांग की है। यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़े कथित बड़ी साजिश के आरोपों से संबंधित है।
5 नवंबर को सामने आई सुप्रीम कोर्ट में याचिका की जानकारी
5 नवंबर 2026 को सामने आई कानूनी रिपोर्टों के मुताबिक, उमर खालिद और शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल की हैं। दोनों ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी नई जमानत अर्जियां खारिज कर दी गई थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों याचिकाएं 4 नवंबर को दाखिल की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, उमर खालिद की याचिका डायरी नंबर 70020/2026 और शरजील इमाम की याचिका डायरी नंबर 70106/2026 के रूप में दर्ज बताई गई है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि याचिका दाखिल करने का अर्थ जमानत मिलना नहीं है। अब शीर्ष अदालत में इन याचिकाओं पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 सितंबर को क्यों खारिज की थी जमानत?
दिल्ली हाई कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर 2026 को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। पीठ में न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट शामिल थे।
हाई कोर्ट ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 के आदेश में दोनों के लिए जमानत पर दोबारा विचार करने की शर्तें तय की थीं। ऐसे में हाई कोर्ट उन निर्देशों में बदलाव नहीं कर सकता।
शीर्ष अदालत के आदेश के अनुसार, दोनों संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने पर या 5 जनवरी 2027 को एक साल की अवधि समाप्त होने पर, इनमें से जो स्थिति पहले आए, उसके आधार पर दोबारा जमानत मांग सकते हैं। हाई कोर्ट ने इसी आदेश को ध्यान में रखते हुए राहत देने से इनकार किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में क्या निर्देश दिया था?
5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, उसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को जमानत दी गई थी।
शीर्ष अदालत ने दोनों की भूमिका को अन्य आरोपियों से अलग माना था। फैसले में कथित बड़ी साजिश में उनकी भूमिका और भागीदारी के स्तर पर विचार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को भविष्य में दोबारा जमानत मांगने का रास्ता दिया था। इसके लिए संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या आदेश के एक साल पूरे होने की शर्त रखी गई थी।
याचिकाओं में गवाहों की गवाही और लंबी हिरासत का मुद्दा
उमर खालिद ने अपनी नई याचिका में कहा है कि अभियोजन पक्ष अब तक संरक्षित गवाहों की गवाही दर्ज नहीं करा पाया है। उन्होंने यह भी दलील दी है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई एक साल की अवधि समाप्त होने के करीब है।
वहीं, शरजील इमाम ने अपनी याचिका में लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे की धीमी प्रगति का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि छह साल से अधिक समय जेल में रहने के बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक गवाहों की जांच शुरू नहीं कर पाया है। ये दोनों पक्षों की ओर से अदालत में रखी गई दलीलें हैं, जिन पर न्यायिक विचार होना बाकी है।
दिल्ली दंगों का मामला और UAPA के तहत आरोप
यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया है कि हिंसा के पीछे एक बड़ी साजिश थी और कई लोगों ने अलग-अलग स्तर पर इसमें भूमिका निभाई।
इस मामले में आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत मुकदमा चल रहा है। पुलिस ने अपनी जांच और चार्जशीट में कथित साजिश, विरोध प्रदर्शनों की योजना और विभिन्न लोगों के बीच संपर्क से जुड़े पहलुओं का उल्लेख किया है।
अभियोजन पक्ष ने कथित साजिश के समर्थन में डिजिटल साक्ष्य और व्हाट्सऐप चैट सहित कई सामग्री पर भरोसा किया है। हालांकि, पुलिस के आरोपों और बचाव पक्ष की दलीलों का अंतिम मूल्यांकन अदालत में मुकदमे के दौरान होना है। किसी आरोपी के खिलाफ आरोप लगना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है।
अब सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्रवाई पर नजर
उमर खालिद और शरजील इमाम की नई याचिकाओं के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अदालत यह देखेगी कि हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर किस तरह विचार किया जाए।
फिलहाल याचिका दाखिल होने से जमानत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दोनों की जमानत पर अंतिम फैसला अदालत की सुनवाई और आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।
इस मामले में एक ओर लंबी न्यायिक हिरासत और गवाहों की गवाही में देरी का सवाल उठाया जा रहा है, तो दूसरी ओर अभियोजन पक्ष के आरोप और UAPA के प्रावधान भी न्यायिक विचार का हिस्सा हैं। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई इस मामले की अगली दिशा तय करने में अहम होगी।

